लेकिन अगले ही दिन से एक नई आदत शुरू हो गई। ज्योति हर छोटी-बड़ी बात अपनी मां को बताने लगी—सुबह क्या बना, सास ने क्या कहा, पति ने क्या किया… सब कुछ।
धीरे-धीरे बातों में रंग भरने लगे, फिर शिकायतें बनने लगीं। उधर ज्योति की मां भी हर बात में सलाह देने लगी—“ऐसा बोलो… वैसा करो…”
कुछ ही दिनों में घर का माहौल बदल गया। छोटी-छोटी बातों पर तकरार होने लगी। कमलेश को बुरा लगता, रमेश जी परेशान रहते, और संजू बीच में फंस जाता।
एक दिन झगड़ा इतना बढ़ गया कि संजू को समझ आ गया—असल वजह कोई इंसान नहीं, बल्कि वो मोबाइल है, जो हर बात को घर से बाहर ले जा रहा है।
गुस्से में उसने एक फैसला लिया। उसने घर के सारे मोबाइल इकट्ठा किए… और आग के हवाले कर दिए।
सब हैरान रह गए।
कुछ दिन तक सब चुप रहे… फिर धीरे-धीरे घर में शांति लौटने लगी। अब बातें सीधे एक-दूसरे से होने लगीं, शिकायतें भी घर में ही सुलझने लगीं।
ज्योति को भी समझ आ गया कि हर बात बाहर बताने से घर टूटता है, और मिलकर बात करने से घर बनता है।