अक्सर सत्संग के पाण्डालों में एक दृश्य आम होता है: एक व्यक्ति जो कीमती गाड़ी से उतरता है, महंगे कपड़ों में होता है, उसे आयोजक तुरंत अगली पंक्ति में स्थान देते हैं। दूसरी ओर, वह साधारण व्यक्ति जो वर्षों से सेवा कर रहा है, जो समय का पाबंद है और जिसके हृदय में गुरु के लिए अटूट श्रद्धा है, वह भीड़ में कहीं पीछे खड़ा रह जाता है।
यह देखकर मन में सवाल उठना लाजमी है—क्या अमीर व्यक्ति सतगुरु के नजदीक जल्दी पहुंच सकता है? क्या माया ज्ञान से बड़ी है?
1. आयोजक की दृष्टि बनाम गुरु की दृष्टि
सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि सत्संग का आयोजन करने वाले लोग और स्वयं सतगुरु (या परमात्मा) दो अलग इकाइयां हैं।
आयोजक: वे अक्सर संसारिक मोह-माया और 'दिखावे' से प्रभावित हो जाते हैं। वे साधन-संपन्न व्यक्ति को इसलिए मान देते हैं ताकि संस्था को दान मिल सके या प्रभाव बढ़े। यह उनकी मानवीय कमजोरी है, न कि अध्यात्म का सिद्धांत।
सतगुरु: गुरु शरीर को नहीं, आत्मा को देखते हैं। उनके लिए रेशमी वस्त्र और फटे कपड़े एक समान हैं। इतिहास गवाह है कि भगवान कृष्ण ने दुर्योधन के छप्पन भोग छोड़कर विदुर जी के घर का साग खाना स्वीकार किया था।
2. 'नजदीक' होने का भ्रम
बाहरी चकाचौंध को देखकर हमें लगता है कि अमीर व्यक्ति गुरु के नजदीक है। लेकिन अध्यात्म में 'नजदीक' होने का अर्थ शारीरिक दूरी नहीं, बल्कि वैचारिक और आत्मिक दूरी है।
जो व्यक्ति अहंकार में है, वह गुरु के चरणों में बैठकर भी उनसे कोसों दूर है।
जो गरीब व्यक्ति पीछे की पंक्ति में बैठकर गुरु की बातों को हृदय से लगा रहा है, वह वास्तव में गुरु के सबसे करीब है।
3. क्या माया ज्ञान से बड़ी है?
संसार की नजरों में माया बड़ी हो सकती है, क्योंकि संसार का आधार ही 'लेन-देन' है। लेकिन रूहानियत के मार्ग पर माया एक परीक्षा की तरह है।
"माया तजे तो क्या हुआ, मान तजा न जाय। मान बड़े मुनिवर गए, मान सबन को खाय॥"
यदि कोई धन के बल पर सम्मान पा रहा है, तो वह उसकी आत्मा की उन्नति नहीं बल्कि उसके अहंकार की तुष्टि है। यह उसे परमात्मा से और दूर ले जाती है।
4. निष्काम सेवा की शक्ति
ब्लॉग का सार यह है कि सत्संग में जो गरीब व्यक्ति समय पर आता है, सबका सम्मान करता है और चुपचाप सेवा करता है, वह 'सच्चा साधक' है। उसकी दौलत उसकी 'श्रद्धा' है। आयोजक उसे भले ही छोटा समझें, लेकिन ब्रह्मांड की शक्तियां और गुरु की मेहर उस पर सदैव बनी रहती है।
निष्कर्ष
अमीर व्यक्ति "सुविधाओं" के जरिए सत्संग के मंच तक जल्दी पहुंच सकता है, लेकिन "सत्य" तक नहीं। परमात्मा के घर में 'मुद्रा' धन नहीं, बल्कि 'भाव' चलती है। इसलिए निराश न हों; दिखावे की भीड़ में खो जाने से बेहतर है, प्रेम की एकांत में गुरु से जुड़ना।
याद रखें: कबीर दास जी भी जुलाहे थे और रविदास जी मोची, फिर भी आज पूरी दुनिया उनके ज्ञान के आगे नतमस्तक है, उस समय के किसी अमीर राजा के आगे नहीं।