भक्ति के मार्ग पर 'सेवा, सिमरन और सत्संग' तीन ऐसे अनमोल रत्न हैं, जो इंसान को इंसानियत और रूहानियत से जोड़ते हैं। हम अक्सर सुनते हैं कि सत्संग वह जगह है जहां ऊंच-नीच, जात-पात और भेदभाव की दीवारें गिर जाती हैं। लेकिन क्या हो, जब इन्ही पवित्र स्थानों पर बैठे कुछ जिम्मेदार लोग ही उन दीवारों को फिर से खड़ा कर दें?
आज की कहानी एक ऐसे ही समर्पित सेवादार की है, जिसने अपने जीवन का हर पल निस्वार्थ सेवा में लगा दिया। उसके लिए सत्संग भवन केवल ईंट-पत्थर का मकान नहीं, बल्कि सुकून का मंदिर था। चाहे लंगर की सेवा हो, सफाई हो, या संगत के जूतों की देखभाल, वह हर काम को सबसे बड़ा सम्मान मानता था। उसके मन में कभी यह ख्याल नहीं आया कि वह कौन सी जाति का है या उसका ओहदा क्या है; उसे बस अपने सतगुरु के चरणों से प्यार था।
लेकिन जीवन कई बार हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है, जहाँ हमारी आस्था की परीक्षा होती है। उस क्षेत्र के सत्संग के मुख्य अधिकारी का देहांत हो गया। समय आया नए अधिकारी को चुनने का। संगत को, और विशेषकर उस सेवादार लड़के को, पूरी उम्मीद थी कि चुनाव का आधार 'समर्पण और सेवा' होगा। उन्हें लगा था कि सतगुरु की रहमत से जिम्मेदारी उसे मिलेगी, जिसने अपना जीवन मिशन के लिए खपा दिया है।
मगर, वास्तविकता कुछ और ही निकली। वहां निर्णय लेने वाले कुछ प्रभावशाली लोगों की नजर में 'सेवा' का कोई मोल नहीं था। जब चुनाव हुआ, तो उन महात्माओं को पूरी तरह अनदेखा कर दिया गया जो बरसों से निस्वार्थ सेवा कर रहे थे, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे कथित 'छोटी जाति' से थे। और अधिकारी किसे बनाया गया? एक ऐसे व्यक्ति को, जिसने न कभी सत्संग में पसीना बहाया था, न कभी सेवा का सुख जाना था। उसकी एकमात्र योग्यता यह थी कि वह उन निर्णय लेने वालों की 'ऊंची जाति' और बिरादरी का था।
यह घटना उस लड़के के लिए किसी सदमे से कम नहीं थी। उसने देखा कि जिन लोगों के हाथों में व्यवस्था है, उनके अंदर भी वही जातिवाद का जहर भरा है, जिसे मिटाने की बात सत्संग में की जाती है। उसका कोमल मन यह देखकर टूट गया कि प्रभु के घर में भी 'सिफारिश' और 'जाति' ने 'भक्ति' को हरा दियाजब विश्वास पर चोट लगती है, तो अक्सर मन कड़वाहट से भर जाता है। उस सेवादार लड़के के सामने भी दो रास्ते थे। पहला रास्ता यह था कि वह भी उसी नफरत, निंदा और चुगली का हिस्सा बन जाता। वह भी जगह-जगह जाकर उन अधिकारियों की बुराई करता, अपना विरोध जताता और यह साबित करने की कोशिश करता कि उनके साथ अन्याय हुआ है। इससे शायद उसके अहंकार को तसल्ली मिलती, लेकिन उसके मन की शांति पूरी तरह खत्म हो जाती।
लेकिन, उसने दूसरा रास्ता चुना—और यही एक सच्चे भक्त की पहचान होती है। उसने गहराई से विचार किया और समझा कि सतगुरु ने उसे जो ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) दिया है, वह किसी जाति, बिरादरी या पद का मोहताज नहीं है। उसने महसूस किया कि जिन लोगों ने उसे नकारा है, वे भले ही पद में ऊंचे हों, लेकिन उनकी सोच अभी भी दुनियावी दीवारों में कैद है। उनके अंदर का जातिवाद यह दर्शाता है कि उन्होंने अभी तक 'मानव को मानव' समझना नहीं सीखा।
इस एहसास के साथ, वह लड़का उस बाहरी दौड़-भाग वाली सेवा से पीछे हट गया, जहाँ अब राजनीति और भेदभाव हावी हो चुका था। उसने फैसला किया कि वह अब किसी इंसान को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि उस परम सत्ता 'निरंकार' को रिझाने के लिए जिएगा।
उसने अपने सतगुरु के वचनों को याद किया: "भक्ति दिखावे का नाम नहीं, यह तो रूह का सौदा है।" उसने समझ लिया कि सतगुरु का ज्ञान पूर्ण है, लेकिन उस ज्ञान को धारण करने वाले इंसान अपूर्ण हो सकते हैं। लोगों की गलतियों के कारण सतगुरु के ज्ञान को छोड़ देना समझदारी नहीं है।
यहीं से उसके जीवन में एक बड़ा बदलाव आया। उसने नकारात्मकता को पूरी तरह नकार दिया। उसने न तो उस नए बने अधिकारी की निंदा की और न ही उन चयनकर्ताओं के खिलाफ नफरत पाली। उसने सोचा, "अगर मैं भी कीचड़ में पत्थर मारूंगा, तो छींटे मेरे ऊपर ही आएंगे।" इसलिए, उसने अपनी ऊर्जा को 'बाहरी सुधार' में व्यर्थ करने के बजाय 'आंतरिक सुधार' पर केंद्रित कर दिया। उसने प्रभु परमात्मा की आराधना अपने भीतर शुरू कर दी। अब उसका मन ही उसका मंदिर बन गया था और उसकी सांसें ही उसकी सेवा बन गई थीं