"जय श्री कृष्णा। आज हम एक ऐसे द्वंद्व पर चर्चा करेंगे जो अक्सर सच्चे साधकों के मन को विचलित कर देता है। एक भक्त, जो उस निरंकार प्रभु को खोजने सत्संग में जाता है, लेकिन वहां उसे मिलता है—भेदभाव। कपड़ों और गाड़ियों को देखकर किया जाने वाला व्यवहार। क्या यह उचित है? और भगवद्गीता ऐसे आचरण के बारे में क्या कहती है? आइए, भगवान श्री कृष्ण की वाणी में इसका उत्तर खोजते हैं।"
स्वर: "अर्जुन, गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट किया है कि जिसे आत्म-ज्ञान हो गया है, या जो सच में उस 'निरंकार' से जुड़ा है, उसकी दृष्टि कैसी होनी चाहिए। अध्याय 5, श्लोक 18 में भगवान कहते हैं:
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
अर्थात्, जो वास्तविक ज्ञानी हैं, वे एक विद्वान ब्राह्मण, एक गाय, एक हाथी, और यहाँ तक कि एक कुत्ते और उसे खाने वाले (चांडाल) को भी समान दृष्टि से देखते हैं।
जहाँ जाति, कपड़े, और अमीरी-गरीबी देखकर व्यवहार बदल जाए, वहाँ 'समदृष्टि' नहीं है। और जहाँ समदृष्टि नहीं है, वहाँ उस निरंकार का वास कैसे हो सकता है? भगवान तो अध्याय 13 में कहते हैं कि 'जो मुझे सबमें समान रूप से देखता है, वही मुझे सच में देखता है।' जो व्यक्ति गाड़ी देखकर सम्मान दे रहा है, वह उस व्यक्ति के अंदर बैठे परमात्मा को नहीं, बल्कि उसकी नश्वर 'माया' को पूज रहा है।"
(गंभीर स्वर में)
स्वर: "आपने पूछा कि क्या वे प्रभु को जान पाए हैं? गीता के 16वें अध्याय में भगवान ने 'दैवी' और 'आसुरी' संपदा का वर्णन किया है। श्लोक 4 में वे कहते हैं:
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥
अर्थात्—पाखंड, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी और अज्ञान—ये सब आसुरी स्वभाव वाले लोगों के लक्षण हैं। जो अधिकारी गरीब को धुतकारते हैं और अमीर के सामने झुकते हैं, वे 'दंभ' और 'अभिमान' से ग्रसित हैं। यह आध्यात्मिकता नहीं, बल्कि आध्यात्मिक होने का 'अहंकार' है। गीता स्पष्ट कहती है कि ऐसे लोग उस परम सत्य से बहुत दूर हैं।"
स्वर: "अब प्रश्न यह है कि क्या ऐसी जगह जाना चाहिए? गीता हमें 'स्वधर्म' और 'विवेक' का पाठ पढ़ाती है। सत्संग का अर्थ है—'सत्य का संग'। यदि किसी स्थान पर जाकर आपके मन में ग्लानि, क्रोध या हीनता आती है, और वहां का वातावरण राग-द्वेष से भरा है, तो वह स्थान आपके लिए बाधक बन सकता है।
लेकिन, भगवान यह भी कहते हैं कि भक्त को हंस की तरह होना चाहिए—जो पानी छोड़कर दूध ग्रहण कर लेता है। यदि आप वहां केवल उस 'निरंकार' के लिए जाते हैं, तो उन अज्ञानी अधिकारियों की उपेक्षा करना सीखें। आपका कनेक्शन उस 'प्रभु' से है, उनके 'द्वारपालों' से नहीं।
परन्तु, यदि वह व्यवहार आपके 'आत्म-सम्मान' को चोट पहुँचाता है और आपकी साधना में विक्षेप डालता है, तो याद रखें—ईश्वर किसी इमारत में कैद नहीं है। अध्याय 18, श्लोक 61 में श्री कृष्ण कहते हैं:
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
वह ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में बसता है। सच्चा सत्संग वही है जहाँ अमीर-गरीब का भेद मिट जाए और सिर्फ प्रेम की भाषा बोली जाए। उस निरंकार को अपने भीतर खोजें, या ऐसे स्थान पर जाएँ जहाँ समता का भाव हो।"
स्वर: "मोह-माया को छोड़ने का दावा करने वाले यदि स्वयं पद और प्रतिष्ठा के मोह में हैं, तो आप उन्हें क्षमा कर दें, क्योंकि वे 'अज्ञानी' हैं। आप अपनी निष्ठा उस समदर्शी परमात्मा में रखें।
जय श्री कृष्णा।"