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क्या ब्रह्मज्ञान के बाद पितरों का सम्मान जरूरी है? कर्मकांड बनाम कृतज्ञता का सच

 आज के दौर में जब हम आध्यात्मिकता या 'सत्संग' की ओर बढ़ते हैं, तो अक्सर एक बात सुनने को मिलती है— "हमें कर्मकांडों में नहीं फंसना चाहिए।" बात सही भी है, क्योंकि अंधविश्वास और दिखावा भक्ति के मार्ग में बाधा है। लेकिन क्या पूर्वजों का मान-सम्मान और उनकी याद में कुछ करना केवल एक 'कर्मकांड' है? या यह हमारी जड़ों के प्रति 'कृतज्ञता' (Gratitude) है?

आज इसी ज्वलंत विषय पर तर्कपूर्ण चर्चा करते हैं।


1. गुरुओं का आचरण: कथनी और करनी का अंतर

अक्सर देखा जाता है कि बड़े-बड़े आध्यात्मिक संस्थानों के प्रमुख और सतगुरु, जब भी कोई विशेष अवसर होता है, तो अपने पूर्ववर्ती गुरुओं या पूर्वजों की याद में विशेष सत्संग या समागम का आयोजन करते हैं। वे उन्हें 'विशेष स्थान' देते हैं।

तर्क यह है: यदि ब्रह्मज्ञान पाने के बाद सब कुछ 'निरंकार' ही है और कोई बंधन नहीं है, तो फिर ये महापुरुष अपने पूर्वजों को इतना सम्मान क्यों देते हैं? उत्तर सीधा है— वे जानते हैं कि जिस वृक्ष की जड़ें नहीं होतीं, वह फल नहीं दे सकता। वे हमें उदाहरण देकर समझाते हैं कि ज्ञान का अर्थ 'अहंकारी' होना नहीं, बल्कि 'विनम्र' होना है।

2. हिंदू शास्त्र और पितृ ऋण

हिंदू शास्त्रों के अनुसार, मनुष्य पर तीन मुख्य ऋण होते हैं: देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण

  • पितृ ऋण का अर्थ यह नहीं है कि आपको अंधविश्वास करना है।

  • इसका अर्थ है कि आज आप जो भी हैं, जहाँ भी हैं, वह आपके पूर्वजों के डीएनए, उनके संघर्ष और उनके संस्कारों के कारण हैं।

  • शास्त्रों में पितरों का आशीर्वाद लेना उतना ही जरूरी बताया गया है जितना ईश्वर की आराधना। क्योंकि पितर हमारे और ईश्वर के बीच की वह कड़ी हैं जिन्होंने हमें इस संसार में आने का माध्यम दिया।

3. क्या पूर्वजों को याद करना 'कर्मकांड' है?

सत्संग में आने वाले लाखों लोग अक्सर यह गलती कर बैठते हैं कि वे 'मुक्ति' और 'निरंकार' के नाम पर अपने माता-पिता और पूर्वजों के प्रति कर्तव्यों को भूल जाते हैं।

"यदि आप जीवित माता-पिता की सेवा नहीं कर सकते और स्वर्गवासी पूर्वजों के प्रति सम्मान का भाव नहीं रखते, तो आपका ब्रह्मज्ञान केवल शब्दों का खेल है।"

पूर्वजों के निमित्त दान करना, उनकी याद में सत्संग कराना या भूखों को भोजन कराना कर्मकांड नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। यह उस विरासत को सम्मान देना है जिसने हमें यह 'शरीर' दिया जिससे हम आज 'हरि' का नाम ले पा रहे हैं।

4. ब्रह्मज्ञान और पितृ पूजा में तालमेल

निरंकार प्रभु का ज्ञान हमें यह सिखाता है कि आत्मा अजर-अमर है। यदि आत्मा अमर है, तो हमारे पूर्वज सूक्ष्म रूप में आज भी हमारे साथ हैं।

  • जब हम उनकी याद में कोई शुभ कार्य करते हैं, तो उनकी आत्मा को शांति और प्रसन्नता मिलती है।

  • उनकी प्रसन्नता हमारे जीवन में 'आशीर्वाद' बनकर सुख-समृद्धि लाती है।

  • यह कोई बंधन नहीं, बल्कि प्रेम का एक प्रवाह है।

5. निष्कर्ष: भटकाव से बचें

सत्संग का अर्थ जड़ों से कटना नहीं, बल्कि जड़ों को और मजबूत करना है। यदि आपके सतगुरु अपने पूर्वजों को मान-सम्मान दे रहे हैं, तो वे आपको इशारा कर रहे हैं कि आप भी अपनी जड़ों को न भूलें। पूर्वजों का निरादर करके या उन्हें विस्मृत करके किया गया कोई भी जप-तप फलदायी नहीं होता।

याद रखें: ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता माता-पिता और पूर्वजों के चरणों से होकर ही गुजरता है। ब्रह्मज्ञान हमें 'मुक्त' करता है, 'लापरवाह' या 'कृतघ्न' नहीं।


लेखक के विचार: आज आवश्यकता है कि हम धर्म के वास्तविक मर्म को समझें। दिखावे वाले कर्मकांडों को छोड़ें, लेकिन हृदय में अपने पितरों के लिए सम्मान और उनकी याद में शुभ कार्य करने की परंपरा को जीवित रखें।


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