क्या कभी हमने ठहरकर सोचा है कि गुरु से ज्ञान लेने और नियमित सत्संग में जाने के बाद भी हमारा स्वभाव क्यों नहीं बदलता? हम प्रार्थना और सत्संग में तो सिर झुकाते हैं, परंतु बाहर निकलते ही दूसरों की कमियां निकालने और इधर-उधर की बातें करने में क्यों लग जाते हैं? ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी यदि जुबान पर चुगली और मन में दूसरों के प्रति द्वेष बना रहे, तो विचार करना आवश्यक है कि हमारी साधना और सोच में कमी कहां रह गई है।
ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य: अंतर्मुखी होना, दूसरों को परखना नहीं
सतगुरु या सत्संग से मिलने वाला ज्ञान कोई बाहरी आभूषण नहीं है जिसे केवल दूसरों को दिखाने या उपदेश देने के लिए पहना जाए। ज्ञान का मूल उद्देश्य मनुष्य को ‘बहिर्मुखी’ से ‘अंतर्मुखी’ बनाना है। जब तक मनुष्य अज्ञान में था, तब तक दूसरों के दोष देखना स्वाभाविक था, परंतु ज्ञान मिलने के बाद भी यदि हम दूसरों के जीवन, उनके रहन-सहन और उनकी गलतियों की चर्चा करते हैं, तो इसका अर्थ है कि ज्ञान अभी केवल हमारी बुद्धि तक पहुंचा है, हृदय में नहीं उतरा।
ज्ञान के बाद चुगली करना: धुले हुए बर्तन में कचरा भरने जैसा
सत्संग का ज्ञान हमारे अंतःकरण को निर्मल, शांत और पावन बनाने के लिए मिलता है। परंतु जब एक साधक या ज्ञानवान व्यक्ति दूसरों की चुगली में रस लेने लगता है, तो वह अपनी संचित की हुई सारी मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा को व्यर्थ कर देता है। संतों ने समझाया है कि ज्ञान लेने के बाद भी निंदा और चुगली करना वैसा ही है जैसे किसी ने बड़े जतन से बर्तन को धोया और फिर उसमें कूड़ा-कचरा भर दिया। चुगली करने से न केवल आपसी प्रेम और विश्वास टूटता है, बल्कि हमारी अपनी साधना भी निष्फल हो जाती है।
हम दूसरों को क्यों आंकने लगते हैं?
अक्सर ज्ञान लेने के बाद व्यक्ति में यह सूक्ष्म अहंकार आ जाता है कि "मैं तो समझदार और ज्ञानी हो गया हूं, पर बाकी लोग अभी अज्ञानी हैं।" यही अहंकार दूसरों को जांचने-परखने और उनकी आलोचना करने का कारण बनता है। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हर व्यक्ति अपने संस्कारों और परिस्थितियों के अनुसार जीवन जी रहा है। किसी के दोष देखना हमारा कार्य नहीं है; हमारा कर्तव्य केवल स्वयं के कर्मों, वाणी और विचारों को पवित्र बनाना है।
चुगली की आदत से मुक्ति पाने के व्यावहारिक सूत्र
वाणी पर पहरा लगाएं: कुछ भी बोलने से पहले स्वयं से पूछें—क्या यह बात सत्य है? क्या इससे किसी का भला होगा? और क्या यह बोलना सचमुच आवश्यक है? यदि उत्तर 'ना' हो, तो मौन धारण करना ही श्रेष्ठ है।
सत्संगियों की संगति का सही उपयोग: जब भी मित्रों या परिजनों से मिलें, तो सांसारिक आलोचनाओं और दूसरों की बुराई के बजाय ज्ञान, सेवा और आत्मचिंतन की चर्चा करें।
दृष्टिकोण बदलें: यदि किसी में कोई त्रुटि दिखे, तो उसकी चर्चा दूसरों से करने के बजाय उसके प्रति सद्भाव रखें और स्वयं में झांकें कि कहीं वही अवगुण मेरे भीतर तो नहीं पनप रहा।
आत्मचिंतन: स्वयं से पूछें ये प्रश्न
क्या ज्ञान लेने के बाद मेरी वाणी में पहले से अधिक मिठास, धैर्य और विनम्रता आई है?
जब कुछ लोग मिलकर किसी की बुराई करते हैं, तो क्या मैं उसमें शामिल होता हूं या विवेक से मौन रहता हूं?
क्या मैं दूसरों के अवगुण देखने में अपना वह कीमती समय नष्ट कर रहा हूं जो मुझे अपने जीवन को संवारने में लगाना चाहिए था?