मिस्टर चड्ढा की सबसे बड़ी समस्या उनकी मोजे पहनने की आदत थी। वे दुनिया के इकलौते ऐसे इंसान थे जो फॉर्मल पैंट के नीचे चमकीले पीले रंग के मोजे पहनते थे, और उनका मानना था कि यह उनकी 'क्रिएटिव पर्सनालिटी' का हिस्सा है। उनके दफ्तर में कोई भी उनसे बात करने की हिम्मत नहीं करता था, क्योंकि चड्ढा जी जब बात करते थे तो अपनी नाक सिकोड़कर ऐसे देखते थे जैसे सामने वाले के शरीर से सड़ी हुई मछली की गंध आ रही हो। वे शहर के सबसे बड़े टेलर थे, लेकिन उनका आधा समय इस बात पर बहस करने में जाता था कि शर्ट की कॉलर आधा इंच ऊपर होनी चाहिए या नीचे।
"अरे भाई, ये मोजे देखो! एकदम फ्रेश वाइब दे रहे हैं," चड्ढा जी ने अपने असिस्टेंट, पिंटू को दिखाते हुए कहा। पिंटू ने एक लंबी सांस ली और खिड़की के बाहर देखा। बाहर दिल्ली की धूप में जंतर-मंतर का नज़ारा कुछ अजीब था। वहां भीड़ तो थी, लेकिन शोर वैसा नहीं था जैसा आम तौर पर राजनीतिक रैलियों में होता है। वहां कोई 'इंकलाब' या 'क्रांति' के नारे नहीं लगा रहा था, बल्कि हवा में कुछ ऐसे शब्द तैर रहे थे जो शायद किसी भी शब्दकोश (dictionary) में नहीं मिलेंगे।
पिंटू ने चड्ढा जी को टोकते हुए कहा, "सर, बाहर देखिए। वहां NEET वाले बच्चों ने कुछ नया शुरू किया है। उन्हें 'कॉकरोच जनता पार्टी' कह रहे हैं। पता नहीं क्या बवाल है, पर शोर बहुत है।" चड्ढा जी ने अपनी ऐनक ठीक की और कौतूहलवश बाहर झाँका। उन्होंने देखा कि वहां लड़के-लड़कियों की एक टोली खड़ी थी, जिनके हाथों में पोस्टर थे, लेकिन पोस्टरों पर लिखे स्लोगन किसी कविता की तरह नहीं, बल्कि किसी स्टैंड-अप कॉमेडी शो की स्क्रिप्ट की तरह लग रहे थे। वहां कोई गंभीर चेहरा नहीं था, बल्कि हर कोई ऐसे हंस रहा था जैसे किसी ने ग्रुप चैट में कोई बहुत ही गंदा और मजेदार मीम भेज दिया हो।
चड्ढा जी, जो खुद को अनुशासन का प्रतीक मानते थे, अपनी पीली मोजों वाली चाल चलते हुए नीचे पहुंचे। वहां का नजारा वाकई अद्भुत था। Gen G के ये बच्चे किसी मंत्री या नेता को गालियां नहीं दे रहे थे, बल्कि उन्हें 'रोस्ट' कर रहे थे। एक लड़की चिल्लाकर कह रही थी, "अरे चाचा, आपकी पॉलिसी उतनी ही पुरानी है जितना आपके बालों का स्टाइल, थोड़ा अपडेट हो जाओ!" जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल हो रहा था, वह इतनी विचित्र और बेतुकी थी कि सुनने वाले को गुस्सा आने के बजाय हंसी आ रही थी। यह गालियों का ऐसा दौर था जिसे सुनकर पंडित नेहरू से लेकर मोदी जी तक, किसी भी प्रधानमंत्री के कान लाल हो जाते, लेकिन यहाँ तो यह एक उत्सव जैसा लग रहा था।
तभी एक लड़का, जिसने चश्मा लगाया हुआ था और हाथ में एक बड़ा सा कार्डबोर्ड पकड़ा था, चड्ढा जी के पास आया। उसने चड्ढा जी के पीले मोजों को देखा और बिना पलक झपकाए बोला, "सर, आपकी फैशन चॉइस तो एकदम 'प्राइमिनिस्टर लेवल' की है, बस फर्क इतना है कि ये स्टाइल किसी भी चुनाव में जीत नहीं सकता!" चड्ढा जी सकपका गए। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी टेलरिंग में बिताई थी, लेकिन इस लड़के ने एक सेकंड में उनके पूरे 'क्रिएटिव व्यक्तित्व' की धज्जियां उड़ा दी थीं। पिंटू पीछे खड़ा होकर अपनी हंसी रोकने की कोशिश कर रहा था, क्योंकि उसे पता था कि चड्ढा जी का ईगो उनके मोजों की तरह ही चमकीला और नाजुक था।
भीड़ के बीच में एक लड़की खड़ी थी जो एक मेगाफोन लेकर चिल्ला रही थी, लेकिन उसकी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक तरह की शरारत थी। उसने चिल्लाकर कहा, "सुनिए ओ कुर्सी-प्रेमियों! हमारा NEET का रिजल्ट देखकर ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने गलती से हमारी मार्कशीट को वॉशिंग मशीन में धो दिया है! अब तो बस इतना ही बचा है कि हम अपनी डिग्री को 'ओल्ड विंटेज आर्ट' घोषित कर दें!" यह सुनते ही वहां मौजूद सैकड़ों बच्चों ने एक साथ ठहाका लगाया। यह कोई पारंपरिक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक लाइव 'रोस्टिंग सेशन' था जहाँ हर नेता की ऐसी-ऐसी क्लास ली जा रही थी कि सुनने वाले को लग रहा था जैसे वह किसी स्टैंड-अप कॉमेडी क्लब में बैठा हो।
चड्ढा जी ने गौर किया कि इन बच्चों का हौसला कमाल का था। वे गालियां तो दे रहे थे, लेकिन उन गालियों में एक अजीब सा संगीत था। वे शब्दों को ऐसे मरोड़ रहे थे कि सुनने वाले का खून खौलने के बजाय उसकी हंसी छूट जाए। एक लड़का चिल्लाया, "मंत्री जी, आपकी बातों में उतना ही दम है जितना कि एक हफ्ते पुराने बासी समोसे में होता है, बस खुशबू थोड़ी और ज्यादा आती है!" चड्ढा जी को महसूस हुआ कि ये Gen G के बच्चे किसी भी प्रधानमंत्री या दिग्गज नेता के सामने झुकने वाले नहीं थे। उनकी भाषा में जो बेबाकी थी, वह किसी पुरानी राजनीतिक किताब में नहीं लिखी थी; यह तो सीधे डिजिटल युग की उपज थी।