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अधिकारी का व्यवहार ही तय करता है कि सेवा बढ़ेगी या सेवादार कम होंगे


धार्मिक स्थानों पर सेवा करना केवल एक कार्य नहीं, बल्कि श्रद्धा और प्रेम की अभिव्यक्ति है। कोई भी व्यक्ति सेवा करने इसलिए नहीं आता कि उस पर अधिकार जताया जाए, बल्कि इसलिए आता है कि उसे परमात्मा की याद में कुछ करने का अवसर मिले।

लेकिन कभी-कभी एक ऐसी स्थिति देखने को मिलती है जो चिंता का विषय बन जाती है। जब किसी अधिकारी का व्यवहार अपने साथ सेवा करने वाले युवाओं या सेवादारों के प्रति कठोर, अपमानजनक या अभद्र हो जाता है, तो उसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। धीरे-धीरे पूरे सेवा वातावरण पर उसका असर दिखाई देने लगता है।

बहुत से युवा उत्साह और श्रद्धा के साथ सेवा में आते हैं। वे अपना समय, मेहनत और ऊर्जा बिना किसी स्वार्थ के लगाते हैं। लेकिन यदि उन्हें सम्मान के स्थान पर अपमान, मार्गदर्शन के स्थान पर डांट और सहयोग के स्थान पर भय का वातावरण मिले, तो उनका उत्साह कम होने लगता है। धीरे-धीरे वे सेवा से दूर होने लगते हैं।

यह समझना आवश्यक है कि अधिकारी का पद अधिकार दिखाने के लिए नहीं, बल्कि सेवा का उदाहरण बनने के लिए दिया जाता है।

एक अच्छा अधिकारी कभी यह नहीं सोचता कि "मेरे नीचे लोग काम कर रहे हैं।" बल्कि वह यह सोचता है कि "मुझे इन सभी के साथ मिलकर सेवा करने का अवसर मिला है।"

नेतृत्व का अर्थ आदेश देना नहीं, बल्कि प्रेरणा देना है। डर से कुछ समय तक काम कराया जा सकता है, लेकिन प्रेम और सम्मान से वर्षों तक लोगों को जोड़े रखा जा सकता है।

यदि किसी सेवा दल से युवा लगातार दूर हो रहे हैं, तो केवल युवाओं को दोष देने के बजाय हमें यह भी देखना चाहिए कि कहीं हमारे व्यवहार में ऐसी कोई कमी तो नहीं, जिसने उनके मन को आहत किया हो।

समस्या का समाधान

  • हर सेवादार का सम्मान करें, चाहे उसकी उम्र या जिम्मेदारी कुछ भी हो।
  • गलती होने पर सबके सामने अपमान करने के बजाय प्रेम से समझाएं।
  • आदेश देने से पहले स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करें।
  • नए युवाओं का उत्साह बढ़ाएं, उनकी बात भी सुनें।
  • सेवा के वातावरण को भय का नहीं, अपनत्व का वातावरण बनाएं।

याद रखिए, सेवा प्रेम से चलती है, दबाव से नहीं। जहां सम्मान मिलेगा, वहां समर्पण भी मिलेगा। जहां अपनापन मिलेगा, वहां नए युवा भी जुड़ेंगे और पुराने भी टिके रहेंगे।

याद रखिए—

"एक अधिकारी की पहचान उसके पद से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से होती है। जो लोगों को सम्मान देता है, वही सबसे बड़ा सेवक और सच्चा नेतृत्वकर्ता कहलाता है।"

यदि हम चाहते हैं कि सेवा बढ़े, युवा जुड़े रहें और धार्मिक स्थान का वातावरण प्रेरणादायक बने, तो सबसे पहले हमें अपने व्यवहार को प्रेम, विनम्रता और सहयोग से भरना होगा। क्योंकि नेतृत्व का सबसे बड़ा गुण अधिकार नहीं, बल्कि सेवा-भाव है।

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