एक महापुरुष ने बहुत सुंदर प्रश्न पूछा—क्या सत्संग भी कभी छोटा या बड़ा होता है?
जहाँ सतगुरु का ज्ञान है, जहाँ प्रभु की याद है, जहाँ प्रेम, सेवा और सिमरन है, वहाँ हर सत्संग महान है। फर्क स्थान का नहीं, संगत की संख्या का नहीं, बल्कि भाव का होता है।
यदि दस लोग भी सच्चे मन से बैठकर प्रभु का गुणगान करें, तो वह भी उतना ही पावन है जितना हजारों की संगत वाला सत्संग।
इसलिए कभी यह मत सोचिए कि यह छोटी सत्संग है या बड़ी। हर सत्संग हमें निरंकार से जोड़ने का एक अनमोल अवसर है। आइए, हर सत्संग को समान श्रद्धा, प्रेम और समर्पण से अपनाएँ।